किराए की कोख - 1 Jeetendra द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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किराए की कोख - 1


भाग: 1 — बाज़ार में ममता

शहर की चकाचौंध से दूर, जहाँ ऊँची इमारतों का साया भी गरीबों की झुग्गियों को डराने आता था, वहाँ शांति का एक छोटा सा कमरा था। कमरा क्या, ईंटों का एक ऐसा संदूक जिसमें चार लोग साँसें ले रहे थे। शांति, उसका पति मदन, और उनके दो बच्चे। हवा में सीलन और गरीबी की वह खास गंध थी जिसे मंटो अक्सर 'इंसानियत के सड़ने की महक' कहा करते थे।

मदन पिछले छह महीने से घर बैठा था। उसकी फैक्ट्री बंद हो गई थी और अब उसकी मर्दानगी केवल शराब की बोतलों और शांति पर चिल्लाने तक सीमित रह गई थी।

"अरे ओ शांति! सुना नहीं क्या? रामू काका कह रहे थे कि शहर के बड़े अस्पताल में कुछ काम है। वे लोग औरतों को अच्छे पैसे दे रहे हैं।" मदन ने बीड़ी का धुआँ छोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी लालची शिकारी की आँखों में होती है।

शांति, जो फटे हुए कपड़ों को सिल रही थी, रुकी। उसने मदन की ओर देखा। "कैसा काम? साफ़-सफाई का? या बर्तन मांजने का?"

मदन हंसा, एक ऐसी हंसी जिसमें कोई रस नहीं था। "नहीं री पगली! बर्तन मांजने के इतने पैसे कौन देता है? वो लोग 'कोख' मांग रहे हैं। बस नौ महीने उनका बच्चा पालना है और फिर... लाखों रुपये हाथ में!"
शांति के हाथ कांप गए। उसे लगा जैसे मदन ने उसके शरीर का सौदा खुले बाजार में कर दिया हो। "क्या बोल रहे हो? अपना बच्चा नहीं, किसी और का? यह कैसे हो सकता है?"

"सब होता है आज के जमाने में! ये बड़े लोग, जिनकी बीवियां पतली रहने के चक्कर में बच्चा पैदा नहीं करना चाहतीं, वे हम जैसों को पैसे देते हैं। सोच, पिंटू की स्कूल की फीस और तेरे ऑपरेशन का खर्चा... सब एक बार में खत्म!" मदन के स्वर में लाचारी कम और एक अजीब सी बेताबी ज्यादा थी।

अगले दिन, मदन शांति को लेकर शहर के सबसे आलीशान 'लाइफ केयर हॉस्पिटल' पहुँचा। वहाँ की सफेदी और एयर-कंडीशनर की ठंडक शांति को काटने दौड़ रही थी। उसे लगा जैसे वह किसी दूसरे लोक में आ गई है।

वहाँ उनकी मुलाकात डॉक्टर खन्ना से हुई। डॉक्टर खन्ना की मुस्कान वैसी ही थी जैसे किसी महंगे होटल के मेनू कार्ड पर छपी फोटो—सुंदर लेकिन बेजान।
"देखिए शांति जी, यह एक नेक काम है। आप एक सूनी गोद भरेंगी और बदले में आपको वह जीवन मिलेगा जो आपने कभी सोचा भी नहीं होगा।" डॉक्टर खन्ना ने फाइलें पलटते हुए कहा।

शांति चुप रही। उसके मन के भीतर एक तूफान था। 'क्या ममता भी खरीदी जा सकती है? क्या मेरे खून से सींचा गया बच्चा मेरा नहीं होगा?' उसके भीतर की औरत चिल्ला रही थी, पर उसके सामने खड़ा उसका लाचार पति और घर की दरिद्र दीवारें उसे खामोश कर रही थीं।

तभी कमरे में दो लोग दाखिल हुए। मिस्टर और मिसेज खन्ना (यह महज इत्तेफाक था कि डॉक्टर और क्लाइंट का सरनेम एक ही था)। मिसेज खन्ना, यानी अवनि, ने धूप का चश्मा हटाया। उसकी त्वचा इतनी साफ थी कि शांति को अपनी फटी हुई बिवाइयां और सांवला रंग देख शर्म आने लगी।

"डॉक्टर, क्या यह हेल्दी है? मेरा मतलब है, कोई बीमारी तो नहीं?" अवनि ने शांति को ऐसे देखा जैसे कोई बाजार में सब्जी खरीदने से पहले उसे उलट-पलट कर देखता है।

मदन ने तुरंत हाथ जोड़ लिए, "मेमसाहब, बहुत तंदुरुस्त है मेरी शांति! दो बच्चे हुए हैं, दोनों फौलाद जैसे हैं। आप बस हुक्म कीजिए।"
शांति को मदन पर घृणा होने लगी। उसे लगा कि वह कोई औरत नहीं, बल्कि एक ज़मीन का टुकड़ा है जिसे उसका मालिक किराए पर चढ़ाने के लिए ग्राहक से सौदेबाजी कर रहा है।

अवनि शांति के करीब आई। उसके महंगे परफ्यूम की खुशबू शांति की नाक में घुस गई। "देखो शांति, हमें एक वारिस चाहिए। नौ महीने तुम्हें हमारे हिसाब से रहना होगा। खाना, पीना, यहाँ तक कि सोचना भी। अगर तुमने सब ठीक किया, तो ये लो..." उसने पर्स से नोटों की एक गड्डी निकाली और मेज पर रख दी।
मदन की आँखें फटी की फटी रह गई। उसने आज तक इतने पैसे एक साथ नहीं देखे थे। शांति ने उन नोटों को देखा और फिर अपने खाली पेट को। उसे महसूस हुआ कि उसकी गरीबी उसकी ममता से कहीं ज्यादा ताकतवर है।

"मंजूर है?" डॉक्टर ने पूछा।
शांति ने एक गहरी सांस ली। उसका गला सूख रहा था। "मंजूर है," उसने धीरे से कहा। उसके शब्द कमरे की ठंडी हवा में जम गए।

समझौता हो गया। शांति अब केवल 'शांति' नहीं थी, वह 'सरोगेट मदर नंबर 12' बन चुकी थी। उसे एक अलग वार्ड में रखा गया जहाँ पाँच और औरतें थीं। उन सबके पेट फूले हुए थे और आँखों में एक अजीब सी वीरानगी थी।

वहाँ शांति की मुलाकात 'रज्जो' से हुई, जो अपना दूसरा 'किराए का बच्चा' पाल रही थी। रज्जो ने शांति को देखते ही हंसकर कहा, "नई आई हो? घबराओ मत। शुरू में बुरा लगता है, फिर आदत हो जाती है। बस यह याद रखना कि जो तुम्हारे अंदर पल रहा है, वह तुम्हारा नहीं, 'चेक' है। उसे बच्चा मत समझना, उसे अपनी किस्मत का ताला समझना।"

शांति बेड पर लेट गई। सफेद चादरें उसे कफन जैसी लग रही थीं। कुछ दिनों बाद प्रक्रिया शुरू हुई। सुइयां, दवाइयां, और डॉक्टरों की मशीनें। उसका शरीर अब उसका नहीं रहा था, वह एक लैब बन चुका था जहाँ किसी और के सपने को आकार दिया जा रहा था।
तीन महीने बीत गए। शांति का पेट अब धीरे-धीरे बाहर आने लगा था। अवनि हफ्ते में एक बार आती थी। वह शांति का हाल नहीं पूछती थी, वह बस अपने 'प्रोजेक्ट' की प्रोग्रेस देखती थी।

"शांति, ज्यादा घी मत खाओ, बच्चा ज्यादा मोटा हो जाएगा तो डिलीवरी में दिक्कत होगी," अवनि हिदायत देती।

शांति मन ही मन सोचती, 'ममता को भी क्या डाइट चार्ट पर तौला जा सकता है?'

एक रात, शांति को महसूस हुआ कि उसके भीतर कुछ हिला। एक नन्ही सी हरकत। वह पहली बार था जब शांति को लगा कि वह कोई मशीन नहीं है। उसके भीतर एक जान धड़क रही थी। उसने अनजाने में अपना हाथ पेट पर रखा और उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई।

तभी उसे रज्जो की बात याद आई— 'इसे बच्चा मत समझना, इसे चेक समझना।'

शांति की मुस्कान गायब हो गई। उसे डर लगने लगा। अगर उसे इस बच्चे से लगाव हो गया, तो वह नौ महीने बाद इसे कैसे दे पाएगी? क्या एक मां अपनी कोख को किराए पर दे सकती है, लेकिन क्या वह अपने दिल को भी किराए पर दे सकती है?

बाहर बारिश हो रही थी। मदन अस्पताल के गेट पर खड़ा सिगरेट पी रहा था और अपने नए घर के सपने देख रहा था। उसे इस बात की कोई फिक्र नहीं थी कि शांति की रूह किस दौर से गुजर रही है।

तभी डॉक्टर खन्ना वार्ड में आए। उनके चेहरे पर थोड़ी चिंता थी। "शांति, तुम्हारी रिपोर्ट में कुछ दिक्कत है। अवनि जी को बुलाना होगा।"

शांति का दिल जोर से धड़कने लगा। "क्या हुआ डॉक्टर बाबू? बच्चा ठीक तो है न?"

डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में वह पुरानी पेशेवर बेरुखी थी। "बच्चा ठीक है, लेकिन... शायद हमें कुछ कड़े फैसले लेने पड़ें।"

शांति को घबराहट होने लगी। क्या उसका 'किराया' खतरे में था? या वह नन्ही सी जान जो उसके भीतर पहली बार हिली थी? आधुनिकता के इस बाजार में, जहाँ हर चीज बिकाऊ थी, शांति को अहसास हुआ कि उसने वह सौदा कर लिया है जिसकी कीमत सिर्फ पैसा नहीं था।

अगले भाग में क्या होगा?

क्या शांति का बच्चा सुरक्षित है? अवनि और मदन का अगला कदम क्या होगा? क्या गरीबी की इस जंग में ममता की जीत होगी या आधुनिकता के बाज़ार में एक और रूह नीलाम हो जाएगी?

जारी.....